वह आवाज हमेशा हमारी चेतना को पुकारती रहती है
दिखाई देना भी कभी ख़त्म नहीं होता
सच्चाई कोई न कोई दुशाला ओढ़ कर सामने आ ही जाती है
महसूस होना कभी रुकता नहीं
अपना, कभी-कभी पराया, दर्द अपनी उपस्तिथि दर्ज करा ही देता है
गंध भी कभी आनी बंद नहीं होती
घृणा हो या प्रेम, मन दोनों से ही महक जाता है
सोच भी कभी एकरस होकर नहीं बैठती, इसका काम ही चलना है
भले ही ये किसी की भलाई के लिए चले, या अपने आप को किसी गर्त में डालने के लिए
ऐसा क्या है जीवन में जो रुका हुआ है
अवसाद से पीड़ित हो, या सफलता में अभिमानी, दोनों ही अपनी अपनी गति से गतिमान है
फिर सोचा की क्या है वो जो सक्षम है, इस वेग को रोक लेने में
इस प्रश्न के जवाब मिला "प्रश्न" में
- अगर व्यक्ति प्रश्न करना छोड़ दे तो जीवन रुक जाता है
निरुत्तर व्यक्ति जीवित है, परन्तु प्रश्न विहीन होना - जीवन विहीन होना है
अगर प्रश्न न हो तो वो आवाज़ कभी हमें सुनाई ही नहीं देगी
जिसके पास उत्तर है
वो दृश्य सामने आएगा ही नहीं
जो हमें सच्चाई की अनुभूति करवा सके
प्रेम और घृणा
प्रश्न के बिना नहीं उपजते
पीड़ा भी तब समझ आती है
जब उसे जान्ने की जिज्ञासा मन में हो
और सोच,
ये तो प्रश्न रूपी ईंधन से ही प्रज्वलित है
तब जीवन की ये नयी परिभाषा सामने आयी
पहले प्रश्न आया, फिर जीवन
और फिर जीवन जीने का प्रश्न, जिसने सब कुछ गतिमान कर दिया
Photo by kilarov zaneit on Unsplash

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