Thursday, 23 January 2020

जब पुछा की क्यों लिखते हो, तो उसे जवाब लिख कर दिया

बिना जाने की किसलिए,
मै उनके साथ चलता चला गया
मैंने ये कभी यह पुछा ही नहीं
की जाना कहा है

बिना कोई और सवाल किये,
मै चुपचाप लोगो को सुनता रहा
मैंने ये कभी सोचा ही नहीं की
क्या मेरे पास कुछ कहने को है

एक समय ऐसा भी आया जब जीवन,
पठकथा रहित एक फिल्म की तरह हो गया
जिसमे ना तो संयोजन था
ना ही कोई मनोरंजन

मस्तिक्ष के इस भूस्खलन से लड़ने के लिए
अपनी सोच को कागज पे उतारना शुरू किया
पहले शब्दों से आने वाले विचार आये,
फिर उन विचारो से निकलने वाले शब्द

कुछ दिनों से



अभी कुछ दिनों से मुझे अचरज होना बंद हो गया है
थोड़े समय पहले जो उत्साहित करता था, वो अब नीरस सा लगता है
मोबाइल पे थिरकती उंगलिया किसी अनजान उत्सुकता की तलाश करती है
लेकिन इस सवा छह इंच के दायरे के बहार अपने आप को ढूंढने की कोशिश में लगा हूँ

अभी कुछ दिनों से बादलो में आकृतिया दिखना भी बंद हो गयी है
यह किसी कमीज पे लगे काले ढब्बो से बढ़कर और कुछ नहीं लगते
शायद मेरा अवचेतन मन भी मुझसे उक्ता गया है, उसे बुनने के लिए आजकल सपने नहीं मिल रहे
लेकिन इस खालीपन के आगे आपने व्यक्तित्य को परिभाषित करने की कोशिश में लगा हूँ

अभी कुछ दिनों से किसी खेल में भी मन नहीं लगता
यह भी बाग़ में लगे उस झूले की तरह है जिसे बच्चो ने कबका भुला दिया है
देखते ही देखते असली मैदान की जगह कृत्रिम भूमि के चलचित्रो ने लेली
लेकिन इस अवास्तविकता में अपनी वास्तविकता को बचाये रखने की कोशिश में लगा हूँ

पर अभी कुछ दिनों पहले इस मझदार के बहार का रास्ता खोज लिया है
यह वह सरम मोबाइल सन्देश है जो मैंने अपने ही मन में सहेज लिया है
अक्सर उबाऊ, सामान्य और निरुत्साह ये जीवन हुआ है
लेकिन इसी को सवारने की कोशिश करते करते करते ये जीवन जीना है

Tuesday, 14 January 2020

फिरसे

आज मुझसे मिलने अरसे बाद वो आया है
पहचानने में थोड़ी देर लगी मुझे, और मुझको फिर ढूंढ लेने में उसे
हाल चाल पूछना हम दोनों ने ही ज़रूरी नहीं समझा उसका अकेलापन भांपने में थोड़ी देर लगी मुझे, और मेरी व्यस्तता समझने में उसे
देर तक हम दोनों चुप चाप बैठे रहे, पहले की ही तरह उसकी ख़ामोशी सुनने में थोड़ी देर लगी मुझे और मेरी नज़रो के पीछे देखने में उसे
हम दोनों कभी एक ही शक्श हुआ करते थे मेरा व्यक्तित्व उसीकी सजगता भरी ख़ामोशी में बना था और उसकी कल्पना मेरे भ्रमित न होने पे निर्भर थी
उसके चले जाने के बाद, बहुत देर तक कुछ ढूंढता रहा मै शायद उसे भूलने में और देर नहीं लगेगी मुझे और फिरसे मुझे याद करने में उसे Photo by @sankla1 /photographer/sankla1-35591 Freeimages.com</a>

Sunday, 12 January 2020

सच की कल्पना

कविता तब बनती है जब हमे अपने अंदर छिपा हुआ कोई सत्य मिल जाता है. वो किसी के बहकाने से नहीं आती, ना ही वो किसी मनुहार से मानती है. कल्पना जिस बात पे इतराती है, उसे शायद यह नही मालुम की उसकी उपज भी किसी न किसी के सत्य से ही हुई है.
शायद कल्पना को जो स्थान सृजन के छेत्र में मिला हुआ है उसकी सही हक़दार सत्यता है.
लेकिन ये सत्य वो नहीं है जो कहने से पूर्व  आपने कहने वाले को अग्नि से हों कर जानें को विवष नही करता .
अपितु ये वो है जिसे ढूंढने के लिए शायद ऋषि मुनि किसी ज़माने में तप किया करते थे,या ये वो भी हो सकता है जिसे कहने वाले को या तो प्रतारणा मिलती है या मृत्यु
ये  जिसभी श्रेणी का सत्य है इतना ज़रूर है की इसको कहने के लिए डर की देहलीज़ को लांघना पड़ता है , प्रस्तुत है ऐसे ही कुछ सत्य या वो कलपना जो सत्य के घोड़े पे सवार हो के अपने को वीरता का आभास कराती है

काफी कमाल के व्यक्ति हो

जब तक जीवन में कुछ पा नहीं लेते ताने और गाली दोनों को अपना लेते हो हर ताने का जवाब नहीं देना आता तुमको मुस्कान की छाया में सबकुछ छुपा लेत...