बिना जाने की किसलिए,
मै उनके साथ चलता चला गया
मैंने ये कभी यह पुछा ही नहीं
की जाना कहा है
बिना कोई और सवाल किये,
मै चुपचाप लोगो को सुनता रहा
मैंने ये कभी सोचा ही नहीं की
क्या मेरे पास कुछ कहने को है
एक समय ऐसा भी आया जब जीवन,
पठकथा रहित एक फिल्म की तरह हो गया
जिसमे ना तो संयोजन था
ना ही कोई मनोरंजन
मस्तिक्ष के इस भूस्खलन से लड़ने के लिए
अपनी सोच को कागज पे उतारना शुरू किया
पहले शब्दों से आने वाले विचार आये,
फिर उन विचारो से निकलने वाले शब्द

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