कविता तब बनती है जब हमे अपने अंदर छिपा हुआ कोई सत्य मिल जाता है. वो किसी के बहकाने से नहीं आती, ना ही वो किसी मनुहार से मानती है. कल्पना जिस बात पे इतराती है, उसे शायद यह नही मालुम की उसकी उपज भी किसी न किसी के सत्य से ही हुई है.
शायद कल्पना को जो स्थान सृजन के छेत्र में मिला हुआ है उसकी सही हक़दार सत्यता है.
लेकिन ये सत्य वो नहीं है जो कहने से पूर्व आपने कहने वाले को अग्नि से हों कर जानें को विवष नही करता .
अपितु ये वो है जिसे ढूंढने के लिए शायद ऋषि मुनि किसी ज़माने में तप किया करते थे,या ये वो भी हो सकता है जिसे कहने वाले को या तो प्रतारणा मिलती है या मृत्यु
ये जिसभी श्रेणी का सत्य है इतना ज़रूर है की इसको कहने के लिए डर की देहलीज़ को लांघना पड़ता है , प्रस्तुत है ऐसे ही कुछ सत्य या वो कलपना जो सत्य के घोड़े पे सवार हो के अपने को वीरता का आभास कराती है
शायद कल्पना को जो स्थान सृजन के छेत्र में मिला हुआ है उसकी सही हक़दार सत्यता है.
लेकिन ये सत्य वो नहीं है जो कहने से पूर्व आपने कहने वाले को अग्नि से हों कर जानें को विवष नही करता .
अपितु ये वो है जिसे ढूंढने के लिए शायद ऋषि मुनि किसी ज़माने में तप किया करते थे,या ये वो भी हो सकता है जिसे कहने वाले को या तो प्रतारणा मिलती है या मृत्यु
ये जिसभी श्रेणी का सत्य है इतना ज़रूर है की इसको कहने के लिए डर की देहलीज़ को लांघना पड़ता है , प्रस्तुत है ऐसे ही कुछ सत्य या वो कलपना जो सत्य के घोड़े पे सवार हो के अपने को वीरता का आभास कराती है

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