Wednesday, 26 May 2021

वो दिन दुबारा नहीं आये

 


फेसबुक पर आज  जब उसकी तस्वीर देखी, तो समझ आया की वो कितना बदल गया है

उसकी फटी पुरानी जीन्स की जगह एक चमकते हुए सूट ने ली हुई थी   

प्रोफाइल पिक में एक घर, कार और दुनिया भर के गंतव्य स्थानों में ली गयी उसकी सेल्फीयां थी 

कभी भुखमरी से सिकुडा हुआ चेहरा आज सफलता की चर्बी से दब सा गया है   


सच, हम वो नहीं रहते, कुछ और बन जाते है 

पर दोस्त तू कितना भी बदल जाये, मुझे आज भी तेरी वही शकल याद है 

जो तू टपरी पे चाय पीने के बाद, पांच रूपये सिगरेट के लिए उधार मांगते वक़्त बनाया करता था 

या एग्जाम में फर्रा गुम जाने पर, मेरी आंसर शीट की झलक दिखाने के लिए 


मेरी बहुत सी भाभियो में से किसी को घुमाने के लिए मेरी बाइक  की चाभी मांगते वक़्त 

सच, कुछ तो है, जिसे बदलना मुमकिन नहीं 


मुझे याद है जब तू पहली पहली बार कॉलेज आया था, 

काम क्रोध मोह और अहंकार, सब बराबर मात्रा में कही से भरवाया था 

विपरीत लैंगिक जीवो की तरफ आकर्षण तो था ही, मद्यपान की वस्तुवो के प्रति समर्पण भी 

सीधा सादा बनाने के सारे जतन तू स्कूल में ही छोड़ आया था 


सच, ये दुनिये किसी को हमेशा बच्चा नहीं रहने देती 

किताबो की जटिलताएं और वाइवा की विफलताए, दोनों तुझे बंक मारने से नहीं रोक पायी 

नयी यंग टीचर की अदाए या अटेंडेंस की सीमाएं, दोनों तुझे लेक्चर हॉल की तरफ कभी नहीं खींच पायी 

मुझे याद है की किसी टेस्ट से पहले तू ये भी पूछ लिया करता था की एग्जाम कोनसा है 


और आज तू अपने फील्ड का सब्जेक्ट मैटर एक्सपर्ट कहलाता है 

सच हम वो नहीं रह पाते, कुछ और बनना पड़ता है 



कुछ साल पहले सबने फिरसे मिलने का प्लान बनाया था  

तूने भी आगे बढ़कर अपना निर्णय सुनाया था   

पर सभी लोग अपनी अपनी व्यस्तताओं के चलते नहीं आ पाए 

'अगली बार पक्का' का वादा एक दूसरे को दे आये 


सच, वक़्त तो शायद लौट कर आ जाता है, पर कभी कभी लोग वक़्त पर नहीं आ पाते 


 

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