उस दिन कुछ पुराने नंबर अपने मोबाइल से छांट रहा था
कुछ नाम तो जाने पहचाने थे और कुछ को तो याद भी नहीं कर पा रहा था
पूरा मोबाइल छानने के बाद ये समझ आया की कितने ही साथी है पुराने जिन्हे भूले हुए भी कई बरस बीत गए है
सभी लोगो से दुबारा संपर्क करना शायद संभव नहीं
परन्तु उनसे जुडी यादो को फिरसे सहेजने का प्रयास कर सकते है
उसी दिन पुराने फोटो एल्बम भी खंगालने लगा
न जाने कौन सा भूला हुआ यादो का खज़ाना हाथ लग जाये
कई तस्वीरो को एक आरसे के बाद देखने के बाद हलकी हलकी मुस्कानो की एक झड़ी सी लग गयी
इन सभी, कभी खो चुकी, तस्वीरो को घर की दीवारों पे लगाना तो मुमकिन नहीं
परन्तु जब भी खुद को फिरसे जानना हो तो इनको दुबारा देखा जा सकता है
फिर बारी अपने चेतना के कुछ पूराने अध्यायो को पलटने की आयी
उन पलो में खुदको या खुदमे उनको ढूंढने लगा,
अपने मस्तिक्ष की इस काल्पनिक किताब को पढ़के जब लौटा तो महसूस हुआ की बहुत से पन्ने तो देखे हि नहीं
अपने जीवन को फिरसे पूरा पढ़ पाना कठिन है,
परन्तु फिरसे लिखने का प्रयास कर सकते है

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