"जानना क्या होता है ?"
बिना किसी मुस्कान के उस मुस्कुराते हुए चहरे ने पुछा
"क्या? "मैंने कहा
"यही की ये जानना आखिर होता क्या है "
सवाल सीधा था और उत्तर मेरे पास था
"जानना मतलब अनजान नहीं रहना" टपक से मेरा जवाब आया
लेकिन संतुष्टि उसके चेहरे से नदारद थी, शायद उस मुस्कान की तरह
"फिर खुद को जानना क्या होता है ?"
"खुद को ?" मैंने पुछा
"हाँ मतलब ऐसा क्यों कहते है की खुद जो जानो"
"क्युकी,,," मैं सोच में पड़ गया
"अपने बारे में सबसे पहले क्या जानना चाहिए"
हम्म, मेरे सोचने की शक्ति विलुप्त हो रही थी
"क्या पहले खामियाँ पहचाने या पहले खूबियों को टटोले ?"
ये तो पहेली हो गयी
"या अपने स्वभाव का चित्र बनाये"
चित्र!, स्वभाव का चित्र ?
"लेकिन फिर सोचा की अपना चित्र कौन बनता है"
ये बात तो है, लेकिन
"और इच्छाओ का क्या, क्या वो ही मुझको मैं नहीं बनाती?"
"सच पर और भी तो बहुत कुछ है जानने को" मैं बोल पड़ा
"क्या"
"यही की पहले ये जानो की ,,, " सचमुच विलुप्त नहीं तो विलुप्ति की कगार पे तो आ ही गयी है मेरी सोच
"पहले ये जानो की क्या जानना है फिर ये की कैसे जानना है, और फिर ये की यह सब जान की क्या करोगे!"
क्या मैं यह सब जान भूझ कर कर रहा हूँ?
"अच्छा मेरा काम पूरा हुआ, अब तुम,,,"
"अब मैं क्या " मैंने उस मुस्कुराते हुए चेहरे को देखा
"अब तुम जानो!"
image credit: Mark Timberlake

No comments:
Post a Comment