गली के मोड़ पर उसने उसको आखिरी बार देखा था
खुद को वही छोड़ कर वह आगे बढ़ गया
बहुत पहले उसने समझ लिया था,
की सब को समझना उसकी समझ से परे हैं
सब में वह खुद भी आता था
उससे मिलने जब वह उसके शहर आया था
आशा ऐसी थी की खुद से भी मुलकात हो जाएगी,
बहुत पहले उसने समझ लिया था
की अपनों को क्षमा करना कितना कठिन होता है
क्षमादान वह खुद को भी नहीं दे पाया था
समय से पहले पहुंचना उसका व्यक्तित्व नहीं था
पर देर होने का डर उसके मिज़ाज़ पे हावी था
बहुत पहले उसने समझ लिया था
की ठंडी कॉफ़ी पीना अब उसकी आदत बन चुकी हैं
और अपनी आदतों से वह खुद भी ऊब चूका हैं
मुलाकात के अंत में दोनों उसी गली के कोने पर विदा हुए
उसके जाने के बाद उसने अपने लौट आने की प्रतीक्षा की
बहुत पहले उसने समझ लिया था,
की खुद को पुकारने के लिए उसे किसी अनुवादक की ज़रुरत नहीं
शायद खुद को मनाने के लिए, वह फिर एक बार इस मोड़ पर आए
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